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सबरीमालाः सदियों पुरानी परंपरा टूटेगी! कौन थे अयप्पा

sabarimala temple: सर्वोच्च अदालत ने अपना ‘सुप्रीम’ फैसला सुनाते हुए सभी उम्र की महिलाओं को सबरीमाला मंदिर में जाने की इजाजत दे दी है। माना जा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से सदियों पुरानी परंपरा टूटेगी और केरल के पत्थनमथिट्टा जिले में स्थित 12वीं सदी के इस मंदिर में 10 से 50 वर्ष तक उम्र की महिलाएं भी भगवान अयप्पा के दर्शन कर सकेंगी।

महिलाओं को थी मनाही
मंदिर में महिलाओं को न जाने देना की वजह थी कि भगवान अयप्पा ब्रह्मचारी हैं। मंदिर प्रबंधन का तर्क था कि श्रद्धालु 41 दिनों का कठिन व्रत करते हैं और फिर मंदिर आते हैं। मान्यता है कि दस से पचास साल की महिलाएं मासिक धर्म के समय वे शुद्धता बनाए नहीं रख सकतीं। इसलिए प्रवेश वर्जित किया था।

कौन थे अयप्पा
पौराणिक कथाओं के अनुसार अयप्पा को भगवान शिव और मोहिनी (विष्णु जी का एक रूप) का पुत्र माना जाता है। इनका एक नाम हरिहरपुत्र भी है। हरि यानी विष्णु और हर यानी शिव। भगवान अयप्पा को अयप्पन, शास्ता, मणिकांता नाम से भी जाना जाता है। इनके दक्षिण भारत में कई मंदिर हैं उन्हीं में से एक है सबरीमाला। इसे दक्षिण का तीर्थस्थल भी कहा जाता है।

कहां स्थित है यह मंदिर
केरल में पत्थनमथिट्टा जिले के पश्चिमी घाट 1535 फीट ऊंची पहाड़ियों पर स्थित है। यह राजधानी तिरुवनंतपुरम से 175 किलोमीटर दूर है।

कैसे पहुंचें
वाहन: तिरुअनंतपुरम से सबरीमाला के पंपा तक बस-निजी वाहन से पहुंचा जा सकता है।
पंपा से जंगल के रास्ते पांच किलोमीटर पैदल ऊंची पहाड़ियों पर अयप्पा के दर्शन होते हैं।
ट्रेन: कोट्टयम या चेंगन्नूर रेलवे स्टेशन पास है। यहां से पंपा तक गाड़ियों से जाना होता है।
विमान: सबसे नजदीकी एयरपोर्ट तिरुअनंतपुरम है, जो सबरीमला से 92 किलोमीटर दूर है।

18 सीढ़ियों का महत्व
मंदिर में 18 पावन सीढ़ियां चढ़नी पड़ती है, जिनके अलग-अलग अर्थ बताए गए हैं।
पहली पांच सीढ़ियों को मनुष्य की पांच इंद्रियों, इसके बाद आठ को मानवीय भावनाओं, अगली तीन सीढियों को मानवीय गुण और आखिर दो सीढ़ियों को ज्ञान-अज्ञान का प्रतीक माना जाता है।

पूजा की प्रक्रिया
श्रद्धालु सिर पर पोटली रखकर पहुंचते हैं। वह पोटली नैवेद्य (भगवान को चढ़ाई जानी वाली चीजें, जिन्हें प्रसाद के तौर पर पुजारी घर ले जाने को देते हैं) से भरी होती है। मान्यता है कि तुलसी या रुद्राक्ष की माला पहनकर, व्रत रखकर और सिर पर नैवेद्य रखकर जो भी व्यक्ति आता है उसकी सारी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

9 माह बंद
नवंबर से जनवरी तक अयप्पा भगवान के दर्शन होते हैं। बाकी पूरे साल मंदिर आम भक्तों के लिए बंद रहता है। भक्तों के लिए मकर संक्रांति का दिन बहुत खास माना जाता है।

यहां अब भी महिलाओं का प्रवेश वर्जित

भगवान कार्तिकेय मंदिर(राजस्थान): पुष्कर के प्रसिद्ध कार्तिकेय मंदिर को लेकर मान्यता है कि जो भी महिलाएं यहां प्रवेश करेंगी वह शापित हो जाएंगी। उन्हें कभी भी आशीर्वाद नहीं लगेगा।

पतबुशी सत्र (असम): यहां स्त्रियों का प्रवेश वर्जित है। हालांकि की लिखित जानकारी मंदिर या आसपास नहीं लगी है लेकिन एक परंपरा अनुसार इसका पालन किया जा रहा है।

रणकपुर मंदिर(राजस्थान): रणकपुर मंदिर उदयपुर से 96 किलोमीटर की दूरी पर है। यह जैन धर्म के पांच प्रमुख तीर्थस्थलों में से एक है। यहां भी महिलाओं का प्रवेश वर्जित है।

पद्मनाभस्वामी मंदिर (केरल): यहां महिलाएं विष्णु भगवान की पूजा तो कर सकती है, लेकिन मंदिर कक्ष में प्रवेश नहीं कर सकती। महिलाओं को पूजा करने के लिए साड़ी पहननी पड़ती है।

यहां भी हटाई गई रोक

शनि शिंगनापुर मंदिर: देसाई की भूमाता रणरागिनी ब्रिगेड ने महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में स्थित शनि शिंगनापुर मंदिर में महिलाओं को प्रवेश करने की अनुमति दिलाने के लिए आंदोलन छेड़ दिया था। इसके बाद अप्रैल 2016 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने महिलाओं को प्रवेश की इजाजत दी।

हाजी अली: साल 2016 में ही महिलाओं ने मुंबई स्थित हाजी अली के दरबार में न सिर्फ माथा टेका बल्कि दरगार पर जियारत के साथ चादर भी चढ़ाई। दरअसल यहां भी दरगाह में प्रवेश को महिला संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगाई थी, सुनवाई के दौरान ट्रस्टी पुरुषों की तरह महिलाओं को मुख्य दरगाह में प्रवेश की इजाजत देने को तैयार हो गए थे।

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